नए साल 2026 के माह जनवरी के तीसरे दिन होगा, तीन शानदार खगोलीय घटनाओं का दीदार। क्या आप हैं तैयार
क्या ऐसा भी होता है? क्या हमारी पृथ्वी सर्दियों में सचमुच सूर्य के सबसे करीब होती है ? और उत्तर सकारात्मक है।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पृथ्वी हर साल जनवरी की शुरुआत में सूर्य के सबसे करीब होती है जब उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों का मौसम होता है और सर्दियों के दौरान उत्तरी गोलार्ध सूर्य से दूर झुका हुआ होता है इसलिए इसे सूरज की तिरछी किरणें प्राप्त होती है।

वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला ( तारामण्डल) गोरखपुर के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोलीय जगत में जब पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट आ जाती है तो इसे पेरीहेलियन कहा जाता है। पेरीहेलियन शब्द ग्रीक से आया है पैरी का अर्थ निकट और हेलिओस का अर्थ है सूर्य । सौर मण्डल में परिक्रमा करने वाले आकाशीय पिंड या प्राकृतिक पिंड पूर्णतया वृताकार पथ में नहीं बल्कि वे सभी अंडाकार ( ओवल) या दीर्घवृत्ताकार पथ में परिक्रमा कर रहे हैं, धरती भी सूर्य की परिक्रमा दीर्घवृत्ताकार पथ में ही करती है जिसका अर्थ है कि इस पथ पर एक बिंदु सूर्य के सबसे निकट है और एक बिंदु सूर्य से सबसे दूर है।
वर्ष 2026 के लिए यह निकटतम बिंदु 3 जनवरी को है जनवरी की शुरुआत में हम सूर्य से लगभग 3% करीब हैं ,लगभग (147.01 मिलियन किलोमीटर)। लेकिन
पेरीहेलियन मोटे तौर पर दिसंबर संक्रांति के लगभग 2 सप्ताह बाद होता है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सूर्य से दूरी ऋतु परिवर्तन का कारण नहीं बनती बल्कि यह पृथ्वी का अक्षीय झुकाव है जो लगभग (23.5 डिग्री है) जो पृथ्वी पर ऋतुओं के परिवर्तन का कारण बनता है। इस दौरान उत्तरी गोलार्ध में सूर्य की रोशनी सबसे कम सीधी पड़ती है इसलिए उन्हें सर्दी का सामना करना पड़ता है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 3 जनवरी 2026 को उपसौर (Perihelion) है।
इस दिन पृथ्वी अपनी कक्षा (orbit) में सूर्य के सबसे निकटतम बिंदु पर होगी। खगोलीय गणनाओं के अनुसार, यह घटना भारतीय समयानुसार (IST) रात के लगभग 10:45 बजे (22:45 IST) या अंतरराष्ट्रीय समय के अनुसार 17:15 UTC पर होगी।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने प्रमुख जानकारी देते हुए बताया कि उपसौर के दौरान पृथ्वी सूर्य से लगभग 14 करोड़ 70 लाख किलोमीटर (91.4 मिलियन मील) की दूरी पर होगी। जो इसकी कक्षा का वह बिंदु है जहाँ यह सूर्य के सबसे निकट होती है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस खगोलीय घटना का गणितीय विवरण देते हुए कुछ इस प्रकार समझाया कि।
समय: पृथ्वी 17:15 UTC पर पेरिहेलियन पर पहुँचेगी। भारतीय समयानुसार (IST) यह रात 10:45 बजे होगा।
दूरी: इस समय पृथ्वी सूर्य के केंद्र से लगभग 14,70,99,894 किलोमीटर (91,403,637 मील) की दूरी पर होगी। यह औसत दूरी से लगभग 25 लाख किलोमीटर कम है।
गति: पेरिहेलियन के दौरान पृथ्वी अपनी कक्षा में सबसे तेज़ गति से चलती है, जो लगभग 30.27 किमी/सेकंड होती है।
अपसौर (Aphelion) इसके विपरीत, जब पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है, उसे ‘अपसौर’ कहते हैं। साल 2026 में यह 6 जुलाई को होगा। लेकिन उपसौर के बारे में बारे मे एक दिलचस्प तथ्य यह है कि अक्सर लोग सोचते हैं कि पृथ्वी के सूर्य के पास वाले बिंदु पर होने पर गर्मी होनी चाहिए, लेकिन उत्तरी गोलार्ध (जैसे भारत) में इस समय कड़ाके की ठंड पड़ती है। तो इसको स्पष्ट कर दें कि इसका कारण सूर्य से दूरी नहीं, बल्कि पृथ्वी का अपनी धुरी पर अक्षीय झुकाव (tilt) है। जनवरी में उत्तरी गोलार्ध,सूर्य से दूर झुका होता है, इसलिए हमें कम धूप और ठंड मिलती है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि 3 जनवरी 2026 को एक विशेष संयोग ही घटित हो रहा है, क्योंकि 3 जनवरी 2026 को ही इस साल का पहला वुल्फ फुल मून (Wolf full Moon) भी दिखाई देगा, जो खगोल विज्ञान में रुचि रखते वाले खगोल प्रेमियों के लिए बहुत ख़ास होने बाला है। इसीलिए इसी 3 जनवरी की रात्रि में (Wolf Moon) वुल्फ मून भी देखेगी दुनिया,
कैसे और कब देखें ये वुल्फ फुल मून।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोल विज्ञान की भाषा में (Wolf moon) वुल्फ मून जनवरी की पूर्णिमा को कहा जाता है, जब चंद्रमा पृथ्वी के करीब होते हुए सामान्य से कुछ बड़ा और चमकीला दिखाई देता है। इसे वुल्फ मून इसलिए कहा जाता है क्योंकि पुराने जमाने में ग्रामीण इलाकों में उस दौरान सर्दियों में भेड़ियों की आवाजें कुछ ज्यादा सुनाई देती थीं, जिस के कारण इसका यह नाम *वुल्फ मून* पड़ा, साफ मौसम में इसे बिना किसी ख़ास खगोलीय उपकरण के आसानी से देखा जा सकता है। पूर्णिमा तब होती है जब चंद्रमा पृथ्वी के दूसरी तरफ होता है जो सूर्य के सामने होता है और इसका चेहरा पूरी तरह से प्रकाशित होता है। चूंकि चंद्रमा का कक्ष पृथ्वी के सापेक्ष अण्डाकार होता है, इसलिए चंद्रमा की पृथ्वी से दूरी पूरे महीने में बदलती रहती है। पूर्ण चंद्र के दौरान चंद्रमा अपनी उच्च अवस्था में दिखाई देगा।
3 जनवरी 2026 को भारत से उल्का बर्षा की खगोलीय घटना भी रात्रि के आकाश में दिखाई देगी।
वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला ( तारामण्डल) गोरखपुर,उत्तर प्रदेश, भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि (Meteor Shower) उल्का वर्षा उतनी साफ़ नहीं भी दिख सकती हैं क्योंकि 3 जनवरी 2026 को ही पूर्णिमा होने के कारण फुल मून (पूर्ण चाँद) भी होगा इस दिन चाँद पूरी तरह से चमकता हुआ दिखाई देगा, जिसे जनवरी का “Wolf Moon” (वुल्फ मून) कहा जाता है। लेकिन भारत से वुल्फ मून का दृश्य स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, अगर आसमान साफ़ हो तो कुछ उल्का वर्षा (Meteor Shower) भी आसानी से देखी जा सकती है।
कौन सी उल्का वृष्टि होगी 3 जनवरी 2026 को।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि वैसे तो इस उल्का वृष्टि को बर्ष की सबसे अच्छी उल्का वृष्टि माना जाता है और यह (Quadrantid meteor shower) क्वाडरेंटिड उल्का वर्षा 28 दिसंबर 2025 से शुरू होकर 12 जनवरी 2026 तक सक्रिय रहेगी, लेकिन 3 जनवरी की रात्रि को इसका शिखर (peak) होगा। लेकिन इस बार पूर्णिमा की उजली चाँदनी के कारण उल्काएँ देखने में कुछ थोड़ी सी कठिनाई भी हो सकती है। पूर्ण चंद्र, मिथुन राशि में आर्द्रा नक्षत्र के निकट होगा लेकिन पूर्ण चंद्र होने के बाद भी इस दौरान आप आकाश की उत्तर पूर्व दिशा में कम से कम 10 से 15 उल्काएं प्रति घंटे आसानी से देख सकते हैं। लेकिन (Quadrantids meteor shower) क्वाडरेंटिडस उल्का वृष्टि, (asteroid) क्षुद्रग्रह 2003 EH1 से उत्पन्न यह बर्षा प्रति घंटे 120 उल्काओं तक के लिए जानी जाती है। लेकिन इस बार एक साथ दृश्यतापूर्णिमा की चांदनी से आकाश उज्ज्वल होने के कारण यह उल्का बर्षा कुछ धुंधली सी दिखेगी क्योंकि चमकीले चाँद की रोशनी छोटी और फीकी उल्का कड़ियों को छुपा देगी, इसलिए केवल कुछ उजली ( “shooting stars” ) (जिन्हें आम बोल चाल की भाषा में टूटते हुए तारे भी कहा जाता है) ही दिख सकती हैं, जोकि 3 जनवरी जो साल की पहली प्रमुख उल्का बौछार है जिसमें अक्सर तेज फायरबॉल (चमकीले उल्का) दिखते हैं, हालांकि 3 जनवरी को पूर्णिमा होने के कारण चांदनी तेज होगी, जिससे कम चमकीले उल्का छिप सकते हैं, इसे देखने का सबसे अच्छा समय मध्य देर रात से सुबह तक, किसी अँधेरी जगह से आकाश की उत्तर दिशा में देखना होगा।
कैसे और किस दिशा में स्पष्ट दिखाई देंगी यह उल्का वृष्टि।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इसको देखने का सबसे अच्छा समय 3 जनवरी 2026 की देर रात 12 बजे के बाद और सुबह होने से पहले (भोर तक) उत्तर पूर्वी आकाश में यह नज़ारा स्पष्ट दिखाई देगा, इस नज़ारे को और भी शानदार देखने के लिए आपको यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि साथ ही ये उल्काएं, बूट्स ( bootes ) तारामण्डल के पास से निकलती हुईं प्रतीत होंगी जिसे इसका रेडियंट पॉइंट कहा जाता है जो सप्तऋषि के पास स्थित है, बूट्स शब्द (Bootes) ग्रीक शब्द से आया है, जिसका अर्थ ‘बैलों का चालक’ या ‘हल चलाने वाला’ (ploughman) है।
यह उत्तरी आकाश में स्थित है और ‘बिग डिपर’ (Big Dipper) या ग्रेट बीयर या इसका हिंदी नाम, सप्तऋषि तारामण्डल के पास पाया जाता है। साथ ही प्रमुख तारा आर्कटुरस (Arcturus) जिसका हिंदी नाम स्वाति है, इस तारामंडल का सबसे चमकीला तारा है, ख़ास बात यह भी है कि स्वाति आकाश का चौथा सबसे चमकीला तारा भी है। कुछ प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार इसे अक्सर Ursa Major (बड़ी भालू) और Ursa Minor (छोटी भालू) तारामंडलों का संरक्षक या रखवाला माना जाता है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि वैसे तो यह यह उल्का वृष्टि आकाश में किसी भी तरफ से आती हुई नजर आ सकती हैं लेकिन रेडियंट पॉइंट की तरफ़ देखने के दौरान यह उल्का वृष्टि अपने चरम पर होगी। लेकिन एक शर्त है कि आपको शहरों की कृत्रिम रोशनी से दूर जाना होगा क्योंकि शहरों में (लाइट पॉल्यूशन) प्रकाश प्रदूषण एक प्रमुख समस्या होती है, इसीलिए यह नज़ारा ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक स्पष्ट दिखाई देता है, लेकिन अगर आसमान में बादल छाएं या कोहरा,और आंधी, पानी, बरसात, तूफान आदि की दशा उत्पन्न हुई,तो दृश्यता शून्य भी हो सकती है इसीलिए इस प्रकार की उल्का वृष्टि को देखने के लिए मौसम का भी विशेष महत्व है। एक मुख्य खगोलीय सुझाव के तौर पर आप शहर की रोशनी से दूर, साफ, स्वच्छ एवं अँधेरी जगह चुनें और अपनी आँखों को अँधेरे में 20-30 मिनट तक ढलने दें ,और मोबाइल की रोशनी ( स्क्रीन लाइट) से भी दूर रहें तब इस क्वाड्रेंटिड उल्का बौछार (Quadrantid Meteor Shower) का आनंद उठा सकते हैं और ध्यान रहे कि इस प्रकार की खगोलीय घटनाओं को देखने के लिए किसी भी ख़ास खगोलीय उपकरण की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अगर आप के पास छोटी दूरबीन या बाईनोकुलर या कैमरा युक्त छोटी दूरबीन भी हैं तो आप इसे और भी अधिक स्पष्ट देख सकते हैं



