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वर्ष 2026 की मकर संक्रांति का सामाजिक एवं वैज्ञानिक महत्व

◆वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला ( तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश ,भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह का संक्षिप्त खगोल वैज्ञानिक लेख◆

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि प्राचीन कालीन भारतीय संस्कृति पर्व और त्यौहारों में भी प्राचीन खगोलीय विज्ञान सम्मिलित रहा है, जिनके कुछ प्राचीन पहलू भी प्राप्त होते हैं, ऐसे ही एक प्राचीन कालीन पहलू पर बात करें तो पाते हैं, उनमें से एक विशेष है मकर संक्रांति,
खगोलविद अमर पाल सिंह ने इस से जुड़े कुछ प्राचीन खगोलीय दृष्टि से सम्बन्धित ख़ास बातें बताते हुए कहा कि मकर संक्रांति का भी वैज्ञानिक और खगोलीय महत्व रहा है,जो आकाशीय पिंडों की गतिविधियों और पृथ्वी पर उनके प्रभाव में निहित है,


खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार इन घटनाओं के पीछे का वैज्ञानिक आधार कुछ इस प्रकार है,

मकर संक्रांति:
एक खगोलीय वैज्ञानिक विश्लेषण।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि मकर संक्रांति के पीछे का खगोल विज्ञान क्या है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन के कारण हम दिन ब रात का अनुभव करते हैं, लेकिन ये दिन ब रात सम्पूर्ण पृथ्वी पर सब जगह एक जैसा नहीं होता है , जितनी सूर्य की किरणें प्रथ्वी के जिस भाग पर पड़ रही होती हैं उसी हिसाब से दिन तय होता है, जैसे प्रथ्वी को दो गोलार्धों में बांटा गया है एक उत्तरी गोलार्ध ब दूसरा दक्षिणी गोलार्ध जिनमें जिस पर पड़ने बाली सूर्य की किरणें प्रथ्वी पर दिन तय करती हैं, और पृथ्वी का अपने अक्ष पर 23.5 अंश झुके होने के कारण दोनो गोलार्धों में मौसम भी अलग अलग होता है, अगर हम बात करें उत्तरायण ब दक्षिणायन की तो हम पाते हैं कि यह एक खगोलीय घटना है, प्राचीन खगोलीय गणनाओं के हिसाब से 14/15 जनवरी के बाद सूर्य उत्तर दिशा की ओर अग्रसर या जाता हुआ होता है,जिसमें सूर्य दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश ( दक्षिण से उत्तर की ओर गमन प्रतीत ) करता है, इसे उत्तरायण या सूर्य उत्तर की ओर के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन आधुनिक वैज्ञानिकता के आधार पर इस घटना के पीछे का मुख्य कारण है पृथ्वी का छः महीनों के समय अवधि के उपरांत उत्तर से दक्षिण की ओर बलन करना,जो कि एक प्राकृतिक खगोलीय प्रक्रिया है ,जो लोग उत्तरी गोलार्ध में रहते हैं उनके लिए सूर्य की इस राशि परिबर्तन के कारण 14/15 जनवरी का दिन मकर संक्रांति के तौर पर मनाते हैं,और उत्तरी गोलार्ध में निवास करने वाले व्यक्तियों द्वारा ही समय के साथ धीरे धीरे मकर मण्डल के आधार पर ही मकर संक्रांति की संज्ञा अस्तित्व में आई है,

क्या अर्थ है मकर संक्रांति का ।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि मकर संक्रांति का अर्थ है सूर्य का क्रांतिवृत्त के दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु पर पहुंचना, प्राचीन काल से सूर्य मकर मण्डल में प्रवेश करके जब क्रांतिवृत्त के सबसे दक्षिणी छोर से इस दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु पर पहुंचता था, तब वह दिन ( 21 या 22 दिसंबर) सबसे छोटा होता था, अमर पाल सिंह ने बताया कि लेकिन आधुनिक गणितीय खगोलीय गणनाओं के हिसाब से देखा जाए तो पाते हैं कि अब सूर्य जनवरी के मध्य में मकर मण्डल में प्रवेश करता है, वजह यह है कि अयन चलन के कारण दक्षिणायनांत (या उत्तरायनारंभ) बिंदु अब पश्चिम की ओर के धनु मण्डल में सरक गया है, अब बास्तबिक मकर संक्रांति (दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु) का आकाश के मकर मण्डल से कोई लेना देना नहीं रह गया है, लेकिन मकर संक्रांति सूर्य के मकर राशि में संक्रमण का प्रतीक होता है जो सूर्य की उत्तर की ओर यात्रा (उत्तरायण) का संकेत माना गया है।
यह परिवर्तन शीतकालीन संक्रांति के बाद होता है जब उत्तरी गोलार्ध में धीरे धीरे दिन लंबे होने लगते हैं, जो गर्मी और नवीनीकरण की शुरुआत का भी प्रतीक है,

मकर संक्रांति का प्राचीन खगोलीय एवं सांस्कृतिक समागम।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि प्राचीन खगोल विज्ञान के अनुसार, इस दिन सूर्य धनु राशि (Sagittarius) को छोड़कर मकर राशि (Capricorn) में प्रवेश करता है। जिसे “संक्रांति क्षण” कहा जाता है।
मकर संक्रांति का “रियल साइंस” (Scientific Facts) क्या है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि प्राचीन काल से ही मकर संक्रांति केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की गति और मौसम परिवर्तन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण खगोल वैज्ञानिक पड़ाव भी रहा है।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि उत्तरायण (Northward Movement) क्या होता है।

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि प्राचीन खगोलीय दृष्टि से इस दिन से सूर्य का ‘उत्तरायण’ शुरू होता है। इसका मतलब है कि सूर्य पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) की ओर बढ़ना शुरू कर देता है। लेकिन आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार, 21-22 दिसंबर (Winter Solstice) को सूर्य सबसे दक्षिण में होता है,

सौर विकिरण में परिवर्तन।

सूर्य के कर्क रेखा की ओर बढ़ने से उत्तरी गोलार्ध में सौर ऊर्जा बढ़ती है, जो जलवायु और कृषि चक्र को तो प्रभावित करती ही है और साथ साथ यह संक्रमण जैविक लय को प्रभावित करता है, जोकि इस समय ख़ासकर उत्तरी गोलार्ध में निवास करने वाले लोगों में कायाकल्प और जीवन शक्ति को प्रोत्साहित करता है जोकि स्पष्ट रूप से महसूस होने लगता है,जैसे कि विटामिन डी का अवशोषण आदि
इस अवधि के दौरान, लोग पारंपरिक रूप से धूप सेंकते हैं या धूप में अधिक समय बिताते हैं, जिससे शरीर को अधिक विटामिन डी का उत्पादन करने में मदद मिलती है, जो हड्डियों के स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा के लिए एक हद तक आवश्यक होता है।


इसके साथ ही खगोल विद अमर पाल सिंह ने बताया कि जैसे कि तिल और गुड़ का सेवन केवल सांस्कृतिक ही नहीं है ,बल्कि ये खाद्य पदार्थ पोषक तत्वों से भी भरपूर होते हैं जो ठंड के महीनों के दौरान शरीर को गर्म और ऊर्जावान बनाए रखने में मदद करते हैं।

 

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