“न्याय नहीं मिला तो जीने का हक भी नहीं” प्रशासनिक उपेक्षा से टूटे तीन अनाथ भाई-बहन, राष्ट्रपति से इच्छा मृत्यु की गुहार

“न्याय नहीं मिला तो जीने का हक भी नहीं”
प्रशासनिक उपेक्षा से टूटे तीन अनाथ भाई-बहन, राष्ट्रपति से इच्छा मृत्यु की गुहार

उत्तर प्रदेश के महराजगंज जनपद से इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहाँ प्रशासनिक उपेक्षा, कथित भ्रष्टाचार और पुलिसिया संवेदनहीनता से त्रस्त होकर तीन अनाथ भाई-बहनों ने महामहिम राष्ट्रपति से इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगी है।
प्रार्थिनी शोभा उर्फ सीमा (32), कुमारी रीना (29) एवं विक्की कुमार (25) निवासी ग्राम बडहरा बरईपार, थाना श्यामदेउरवां, जनपद महराजगंज (वर्तमान पता—गोरखपुर) अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखते हैं। तीनों भाई-बहन अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद पूरी तरह अनाथ हो चुके हैं।

◆फर्जीवाड़े से हड़पी गई पैतृक संपत्ति◆
पीड़ितों के अनुसार, वर्ष 2010 में पिता की मृत्यु के बाद मानसिक रूप से अस्वस्थ मां अनारी देवी को बहला-फुसला कर मिठाईलाल (सेवानिवृत्त नाजिर) ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर पूरी पैतृक संपत्ति फर्जी तरीके से रजिस्ट्री करा ली। उस समय पीड़ित नाबालिग थे।
◆लंबे संघर्ष के बाद 2014 में अधिकारियों ने उन्हें कब्जा तो दिलाया, लेकिन 2019 में मिठाईलाल द्वारा एक बार फिर षड्यंत्र रचते हुए मां की जमीन बिकवा दी गई। आरोप है कि 21 जून 2019 को अनारी देवी की हत्या भी कराई गई, जिसका मुकदमा आज भी न्यायालय में लंबित है और पीड़ितों को अब तक कोई सरकारी सहायता नहीं मिली।◆
◆फर्जी दस्तावेज, चरित्र हनन और पुलिस पर गंभीर आरोप◆
पीड़ितों ने आरोप लगाया कि छोटी बहन रीना को फर्जी दस्तावेजों से “विधवा” और सीमा को “तलाकशुदा” दर्शाया गया। इतना ही नहीं, 2025 में तहसील स्तर पर कथित साठगांठ से उनके विरासत अधिकार विपक्षी के पक्ष में कर दिए गए।
जब पीड़ितों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मुकदमा दर्ज कराया, तो जांच के दौरान थाना प्रभारी पर रिश्वत मांगने, गवाहों को डराने-पीटने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। शिकायत करने पर कथित तौर पर मुकदमे में बिना ठोस आधार फाइनल रिपोर्ट लगा दी गई और विपक्षियों को संपत्ति पर कब्जा करा दिया गया।
तहसील आदेश में अपमानजनक टिप्पणी
पीड़ित बहनों का कहना है कि तहसीलदार सदर महराजगंज के आदेश में उनके खिलाफ अपमानजनक और चरित्र हनन करने वाली टिप्पणी की गई, जिससे उनका सामाजिक सम्मान पूरी तरह कुचल दिया गया।
“अब जीने की कोई वजह नहीं बची”
14 वर्षों से न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते तीनों भाई-बहन आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट चुके हैं। मजदूरी की कमाई मुकदमों में खत्म हो चुकी है, न रोजगार है, न संपत्ति और न ही बहनों की शादी का कोई सहारा। इसी टूटे हुए मन से उन्होंने महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिखकर कहा है—
“हम इन भ्रष्ट अधिकारियों से अब नहीं लड़ सकते। हमारा धैर्य टूट चुका है। इसलिए हमें इच्छा मृत्यु देने की कृपा की जाए, ताकि हम अपने मानवीय सम्मान की रक्षा कर सकें।”
प्रशासन और सरकार के लिए बड़ा सवाल
यह मामला सिर्फ तीन भाई-बहनों की पीड़ा नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था, पुलिस और प्रशासन की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। अब देखना यह है कि क्या शासन-प्रशासन इस मार्मिक पत्र को चेतावनी मानकर निष्पक्ष जांच और न्याय दिलाने की पहल करता है, या फिर एक और परिवार व्यवस्था की भेंट चढ़ जाता है।



